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25 हजार पदों पर चयन ही अधूरा, 72825, 29334, 15000 ,16448 व् उर्दू भर्तियों में खाली हैं 25000 पद

25 हजार पदों पर चयन ही अधूरा

धर्मेश अवस्थी, इलाहाबाद : सूबे की लंबित भर्तियों में चयनित युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटने के निर्देश हुए हैं। अन्य विभागों की तुलना में बेसिक शिक्षा परिषद में नियुक्तियों की तस्वीर बिल्कुल अलग है। पिछले तीन वर्षो में शिक्षकों की यहां नौ भर्ती प्रक्रिया शुरू हुईं। उनमें तीन लाख पांच हजार 457 नियुक्तियों के सापेक्ष दो लाख 79 हजार 530 नियुक्तियां भी हुईं, लेकिन अब भी 25 हजार 927 पद खाली हैं। यह पद सभी भर्तियों में अवशेष बचे हैं। इसमें कुछ विशेष आरक्षित वर्ग के हैं वहीं अधिकांश पद इसलिए खाली रह गए कि भर्ती का प्रकरण न्यायालय की चौखट लांघ गया। यह पद कब भरे जाएंगे और किसे नियुक्ति पत्र मिलेगा यह भविष्य के गर्भ में है।

प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में 72825 शिक्षकों की भर्ती हो या उच्च प्राथमिक स्कूलों में 29334 शिक्षकों की भर्तियां। इनकी भर्ती प्रक्रिया शुरू हुए दो साल बीत रहे हैं अब तक यह पूरी नहीं हो सकी हैं। 72 हजार शिक्षक भर्ती में करीब आठ हजार तो 29 हजार भर्ती में लगभग चार हजार पद रिक्त हैं। नियुक्ति संबंधी विवाद होने पर इनके प्रकरण न्यायालयों में पहुंचे तो भर्ती जहां की तहां ठप हो गई। इसी तरह शिक्षा विभाग में उर्दू भर्ती, बीटीसी भर्ती व समय-समय पर शुरू होने वाले अन्य नियुक्तियों में तमाम पद रिक्त हैं। उनको भरने का न प्रयास हो रहा है और न ही किसी को इसकी चिंता है। अफसर यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि अधिकांश रिक्त पद विशेष आरक्षित वर्ग के हैं, जब इन पदों के लिए उस वर्ग के अभ्यर्थी नहीं आए हैं तो उन्हें कैसे भरा जाएगा।

नई नियुक्तियों में ही नहीं समायोजित शिक्षकों के प्रकरण में भी अभ्यर्थी छूटे हैं। प्राथमिक विद्यालयों में एक लाख 37 हजार शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के रूप में समायोजित कर दिया गया है, लेकिन करीब 32 हजार शिक्षामित्र अब भी समायोजन की राह देख रहे हैं।

16645 भर्तियां जहां की तहां ठप : राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में एलटी ग्रेड शिक्षकों के 6645 पदों पर भर्ती के लिए 29 अक्टूबर 2014 को शासनादेश जारी हुआ। इसमें युवाओं से मंडल स्तर पर आवेदन मांगे गए। एक ही अभ्यर्थी के कई मंडलों में आवेदन करने के कारण मेरिट सूचियों में लगातार बदलाव होता रहा। जिनका चयन हुआ उनमें से बड़ी संख्या में ऐसे भी थे जिनके अंकपत्र जांच में फर्जी मिले। लिहाजा 2100 पदों पर ही चयन हो पाया। अब शेष पदों पर नई नियमावली के तहत चयन किया जाएगा।

अभी चयन कार्य शुरू नहीं : अशासकीय माध्यमिक कालेजों के लिए माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड शिक्षकों का चयन कर रहा है। पिछले छह माह से सिर्फ 2013 का चयन चल रहा है, जबकि 2011 की चयन प्रक्रिया अभी शुरू होना शेष है। वहीं, टीजीटी-पीजीटी 2016 की परीक्षा तक अभी नहीं कराई जा सकी है

Shiv Kumar Saturday, December 10, 2016
ग्राम प्रधानों ने बनाई एमडीएम से दूरी

हाथरस : 114 ग्राम प्रधानों ने बनाई एमडीएम से दूरी, जिलाधिकारी ने इन ग्राम पंचायतों में एनजीओ के स्तर से मिड डे मील वितरित कराने के दिए निर्देश

संवाद सहयोगी, हाथरस : मिड डे मील योजना का क्रियान्वयन कराने में अब ग्राम प्रधानों की रुचि नहीं है। नए प्रधान चुन लिए जाने के बाद अब करीब एक सौ चौदह ग्राम प्रधानों ने इस योजना से अलग रहने का निर्णय लिया है। अब जिलाधिकारी ने इन ग्राम पंचायतों में बच्चों को एनजीओ के जरिए मिड-डे मील उपलब्ध कराया जाएगा। इसके निर्देश जिलाधिकारी के स्तर से जारी हो चुके हैं।

बेसिक शिक्षा के विद्यालयों में दोपहर के वक्त मिड डे मील बच्चों को उपलब्ध कराया जाता है, जिलें में करीब पन्द्रह सौ विद्यालय संचालित है,जिनमें तीन हजार से अधिक शिक्षक है। नगर क्षेत्र के विद्यालयों में अभी तक एनजीओ के स्तर से मिड डे मील वितरित किया जाता था। 1देहात क्षेत्र के विद्यालयों में हेड मास्टर अपने सामने रसोईयों से मिड डे मील बनवाते है। बताते चले कि कनवर्जन कास्ट और खाद्यान्न के बजट में ग्राम प्रधान और हेड मास्टरों के संयुक्त हस्ताक्षर होते हैं। उसी के बाद पैसा आहरित हो पाता है, पूर्व में कई ग्राम प्रधान इसे लेकर विवादों में रह चुके है।

अब नए ग्राम प्रधानों के चयनित हो जाने के बाद उनके उपर मिड डे मील योजना की जिम्मेदारी आनी थी। लेकिन जिले के करीब 114 ग्राम प्रधानों ने इससे दूरी बना ली और इसकी जानकारी जिलाधिकारी शमीम अहमद को दे दी। सासनी के 43, मुरसान के 26,हाथरस के 26,सादाबाद के 04 और सहपऊ के 15 ग्राम प्रधान शामिल है। ग्राम प्रधानों के दूरी बना लेने के बाद मिड डे मील वितरित कराने को लेकर सब परेशान हो गए। अब जिलाधिकारी ने इन ग्राम पंचायतों में एनजीओ के स्तर से मिड डे मील वितरित कराने के निर्देश बीएसए देवेन्द्र गुप्ता को दिए। बताते चले कि एनजीओ भी आए दिन मिड डे मील वितरित करने को लेकर विवादों में रहती है। अब अतिरिक्त जिम्मेदारी मिल जाने के बाद क्या वो क्रियान्वयन बेहतर तरीके से होगा ।

Shiv Kumar Saturday, February 27, 2016
परिषदीय वार्षिक परीक्षा संबंधी

10 फरवरी - परिषद से आदर्श प्रश्न पत्र प्राप्त
20 फरवरी तक - प्रश्न पत्रों का निर्माण
5 मार्च तक - प्रश्न पत्रों का मुद्रण एवं सीलबंद, डायट में रखना
10 मार्च तक - सभी एबीएसए को सीलबंद प्रश्न पत्र पैकेट उपलब्ध कराना
12 मार्च तक - सीलबंद पैकेट संकुल के विद्यालय में पहुंचाना
14 से 21 मार्च - कक्षा 2 से 8 तक की वार्षिक परीक्षाएं
22 से 27 मार्च - उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन
28 से 29 मार्च - परीक्षाफल निर्माण
30 मार्च - परीक्षाफल घोषणा

परिषदीय वार्षिक परीक्षा संबंधी महत्वपूर्ण तिथियां, परिषदीय स्कूलों की परीक्षा में दिखेगी बोर्ड परीक्षाओं जैसी झलक,
14 से 21 मार्च तक संचालित होने वाली परिषदीय विद्यालयों के कक्षा 5 व 8 की वार्षिक परीक्षाओं में बोर्ड व्यवस्था की झलक मिलेगी। इन दोनों कक्षाओं के विद्यार्थियों की कॉपियां उसी विद्यालय के शिक्षक नहीं जांच सकेंगे।
नई व्यवस्था के तहत कक्षा 5 की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन न्याय पंचायत स्तर पर होगा जबकि कक्षा 8 की कॉपियां ब्लॉक स्तर पर जांची जाएंगीं। 1 कक्षा 8 तक की सभी परीक्षाओं के लिए परिषद से प्राप्त आदर्श प्रश्न पत्रों की सीडी के आधार पर प्रश्न पत्रों का निर्माण होगा, जिन्हें सीलबंद पैकेटों में विद्यालयों में परीक्षा के दिन ही खोला जाएगा।
इस वर्ष नए प्रावधान के अनुसार कक्षा एक के बच्चों की लिखित परीक्षा नहीं होगी, उनकी मौखिक परीक्षा ली जाएगी। वहीं कक्षा 5 की वार्षिक परीक्षाओं का मूल्यांकन न्याय पंचायत स्तर पर होगा।
इस व्यवस्था में कक्षा 5 के छात्र की कॉपी उसी के विद्यालय के अध्यापक या हेड मास्टर नहीं जांच पाएंगे। इसी प्रकार कक्षा 8 के परीक्षार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन ब्लॉक स्तर पर होगा और इनको भी दूसरे विद्यालय के शिक्षक जांचेंगे।
राज्य शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद लखनऊ से प्राप्त सीडी को प्रश्न पत्र निर्माण समिति (अध्यक्ष डायट प्राचार्य, सचिव बीएसए, वरिष्ठ एबीएसए सदस्य, जिला समन्वयक प्रशिक्षण सर्व शिक्षा अभियान सदस्य) द्वारा गोपनीय रूप से देखने के बाद उसमें आवश्यक संशोधन कर 20 फरवरी तक जनपद स्तर पर प्रश्न पत्रों का निर्माण होगा और 5 मार्च तक प्रश्न पत्रों का मुद्रण कर सीलबंद पैकेट में डायट प्राचार्य की संरक्षा में रखवा दिया जाएगा।
परीक्षा प्रारंभ होने के तीन दिन पहले (10 मार्च तक) ये पैकेट सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को उपलब्ध कराए जाएंगे जिन्हें वे परीक्षा तिथि से दो दिन पूर्व (अथवा 12 मार्च तक) केंद्रीय विद्यालय (संकुल का विद्यालय) में पहुंचाएंगे।
संकुल विद्यालय के प्रधान अध्यापक द्वारा परीक्षा तिथि को विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को उपलब्ध कराएंगे।
प्राथमिक कक्षाओं के प्रश्नपत्रों की लागत दर 2.5 रुपये प्रति बच्चा और उच्च प्राथमिक की 5 रुपये प्रति बच्चा है। इसमें सीलिंग व पैकेजिंग का भी व्यय शामिल है। मुद्रण कमेटी की देखरेख में गोपनीय तरीके से प्रश्न पत्रों की छपाई होगी।
इस समिति के अध्यक्ष डायट प्राचार्य, सचिव बीएसए व सदस्य लेखाधिकारी होंगे। इसी प्रकार उत्तर पुस्तिकाओं के लिए प्राथमिक स्तर तक 7.50 रुपये प्रति बच्चा और जूनियर स्तर तक 15 रुपये प्रति बच्चा की दर से विद्यालय प्रबंधन कमेटी के खाते में धनराशि पहुंचा दी जाएगी।
फ्लाइंग एस्कॉर्ट करेगा निगरानी-
बोर्ड परीक्षाओं की तर्ज पर ब्लॉक में खंड शिक्षा अधिकारी के नेतृत्व में उड़न दस्ता बनाए जाएंगे जो परीक्षा की निगरानी करेंगे और जिला स्तर पर भी फ्लाइंग एस्कॉर्ट बनाया जाएगा जो प्रश्न पत्रों के रख रखाव, नकल, परीक्षा व्यवस्था आदि की निगरानी करेगा।

Shiv Kumar Saturday, February 13, 2016
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा महिला खंड शिक्षा अधिकारी का उत्पीड़न

अमरोहा। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी गिरवर सिंह महिला खंड शिक्षा अधिकारी के उत्पीड़न और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में फंस गए हैं। डीजीपी स्तर से मिली जांच पूरी होने के बाद सीओ सिटी ने कोतवाली पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए हैं।
गजरौला ब्लाक में बबीता सिंह बतौर खंड शिक्षा अधिकारी तैनात हैं। आरोप है कि अगस्त माह में दो माह के अवकाश के बाद जब उन्होंने कार्यभार ग्रहण किया, तो पता चला कि उनके खंड में एक और बीईओ राकेश गौड़ को तैनात कर दिया गया है। इस संबंध में 18 नवंबर को बीएसए गिरवर सिंह से मिलने उनके दफ्तर पहुंची तो उन्होंने बबीता सिंह के साथ दुर्व्यवहार किया और जान से मारने तक की धमकी दी। इस पर बीईओ बबीता सिंह ने डीजीपी हेल्पलाइन पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई।
आरोप है कि इसके बाद बीएसए ने बबीता सिंह का उत्पीड़न शुरू कर दिया। बीईओ राकेश गौड़ भी उनके खिलाफ तरह तरह की साजिश रच रहे हैं। डीजीपी कार्यालय से जांच के आदेश एसपी के पास आए और एसपी ने सीओ सिटी शील कुमार को जांच सौंपी। 23 दिसंबर को बबीता सिंह के बयान दर्ज किए गए। बृहस्पतिवार को सीओ सिटी ने कोतवाली पुलिस को बीएसए के खिलाफ मुकदमा कायम करने के आदेश दिए।
साथ ही विभागीय जांच की संस्तुति भी की, फिलहाल लिखित आदेश कोतवाली को प्राप्त नहीं हो सके हैं। कोतवाल शैलेंद्र प्रताप गौतम ने बताया कि अभी आदेश प्राप्त नहीं हुए हैं, जैसे ही आदेश मिलेगा मुकदमा दर्ज कर दिया जाएगा।
महिला खंड शिक्षा अधिकारी ने लगाया था उत्पीड़न करने का आरोप
सीओ सदर ने पूरी की जांच, रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश
बीएसए के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश कोतवाली पुलिस को दे दिए गए हैं। साथ ही बेसिक शिक्षा विभाग को इस प्रकरण में विभागीय जांच के लिए भी कहा गया है।
-शील कुमार क्षेत्राधिकारी सदर
बीईओ बबीता सिंह द्वारा लगाए गए आरोप बेबुनियाद है।

Shiv Kumar Thursday, January 7, 2016
शिक्षक दंपती ने ले लिया दोहरा एचआरए
शिक्षक दंपती ने ले लिया दोहरा एचआरए
। आरटीआई
एक्ट के इस्तेमाल से एक शिक्षक दंपती के दोहरे एचआरए का लाभ लेने का खुलासा हुआ। इस पर राज्य सूचना आयोग के सख्त रुख पर बेसिक शिक्षा विभाग ने दोहरे लाभ के तहत ली गई धनराशि को सरकारी खजाने में जमा करवाया।
आगरा के भीम सिंह सागर ने मुरादाबाद के वित्त व लेखाधिकारी बेसिक शिक्षा से पूछा था कि क्या बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में कार्यरत पति-पत्नी दोनों को आवास भत्ता (एचआरए) दिया जा सकता है। निर्धारित 30 दिन के भीतर सूचना न मिलने पर उन्होंने राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। इस पर राज्य सूचना आयुक्त हाफिज उस्मान ने वित्त व लेखाधिकारी को सूचना उपलब्ध कराने के आदेश दिया व आदेश का पालन न करने पर दंड लगाने की चेतावनी भी दी।
वित्त व लेखाधिकारी ने आयोग को बताया कि जिले में दोहरे एचआरए का सिर्फ एक मामला सामने आया है। इसमें शकुंतला देवी पत्नी हर प्रसाद, सहायक अध्यापक कन्या विद्या प्रसार जूनियर हाईस्कूल ने मार्च 2010 से अप्रैल 2011 के बीच नियमों में न आते हुए भी आवास भत्ता लिया। उनसे 1 लाख 40 हजार रुपया सरकारी खजाने में जमा करवा लिया गया है। उधर, राज्य सूचना आयुक्त ने सूचना न देने वाले 12 जन सूचना अधिकारियों पर 25-25 हजार रुपये जुर्माना लगाया है। इनमें रामपुर के नगर मजिस्ट्रेट, चांदपुर (बिजनौर) के एसडीएम व जिला प्रबंधक, उत्तर प्रदेश राज्य खाद्य आवश्यक वस्तु निगम (बिजनौर) आदि प्रमुख हैं।
•आरटीआई से हुआ खुलासा, सरकारी खजाने में जमा करनी पड़ी पूरी रकम

Shiv Kumar
एक शिक्षक के लिए विचारणीय बिंदु

पोस्ट थोड़ी बड़ी किन्तु पढ़ें जरूर........

विचारणीय बिन्दु......

अधिकारी अफसर विद्यालयों का निरीक्षण कर रहे हैं और रोज अखबारों में आ रहा है कि फलाना स्कूल चेक हुआ और बच्चों से राजधानी पूछी, मुख्यमन्त्री का नाम पूछा और बच्चों को नहीं आया, इसी क्रम में एक खबर आयी कि एक शिक्षिका को black board पर  अंत्येष्टि शब्द गलत लिखते हुए देखा और उस अध्यापिका का नाम व फोटो अखबार में छाप दिया ।
अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा करके समाज में, लोगों को, अभिभावकों को क्या सूचना और सन्देश दिया जा रहा है? यही कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को विषय का ज्ञान नहीं है? उनको हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, आदि नहीं आती ?
बड़ा विरोधाभास है ........ एक तरफ सरकार कहती है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन बढे, ज्यादा बच्चे जुड़े, कोर्ट में केस दाखिल किये जा रहे हैं किसरकारी स्कूल में अफसरों के बच्चे पढ़ाई करें और दूसरी तरफ शिक्षकों की गरिमा और मर्यादा तथा उअनके ज्ञान को धूमिल किया जा रहा है| ऐसी खबरें आने के बाद अभिभावक गण और समाज में ये सोच पनपेगी कि मास्टरों को कुछ नहीं आता, "मास्टर" यही शब्द अब संबोधन का ज़िंदा रह गया और गुरु जी जैसे लफ्ज गायब हैं ।

एक सोचनीय तत्व ये है कि अफसर किस उद्देश्य स्कूलों का निरीक्षण करने जाते हैं? अपनी अफसरी दिखाने? अध्यापकों को नीचा दिखाने? उनको अपमानित करने? अपना रौब दिखाने? उनको फटकार लगाने? .....  ...... ?
निंदनीय है  ......... 
नकारात्मक है ........
गलत है .......
होना तो यह चाहिए कि अफसरों को शिक्षकों और बच्चों को प्रेरित करना चाहिए, उनका morale up करना चाहिये, उनको boost करना चाहिए, एक जोश भरना चाहिए,कोई कमी दिखे भी तो शिक्षकों और बच्चों में सकारात्मक ऊर्जा भरनी चाहिए, अपमानित करने से तो शिक्षक निराश हो जाएगा ।

अच्छा , इन अफसरों के प्रश्न होते भी ऐसे हैं जो syllabus से बाहर के होते हैं, अफसरों का उद्देश्य सुधारवादी नहीं, आलोचनात्मक दृष्टिकोण लिये होता है कि शिक्षक की गलती नजर आये बस, और हम अपना रौब दिखाए, एक अफसर ने लेफ्टिनेंट शब्द पूछा था शिक्षक से, क्योंकि यह अब अप्रचलित शब्द है और लेफ्टिनेंट अंग्रेजी में lieutenant लिखा जाता है ।

हिन्दी में तो और भी कठिन शब्द हैं जो भ्रमित करते हैं  और किताबों में, अखबारों में गलत वर्तनी ही प्रचलित है जैसे उपरोक्त शब्द मिलता है सही शब्द उपर्युक्त कि जगह, कितने लोग जानते हैं कि कैलाश शब्द गलत है और कैलास सही, दुरवस्था सही है दुरावस्था गलत, सुई नहीं सूई शब्द सही है, अध:पतन को अधोपतन लिखा जाता है,  हिन्दी भाषा की सही वर्तनी पूरे भारत में ही गिने-चुने लोग सही लिख पायेगे, दो aunthentic (प्रमाणिक) किताबों में एक में दोपहर सही शब्द माना है और एक ने दुपहर, भगवान जाने स्थाई शब्द सही है या स्थायी? दवाई शब्द तो होता ही नहीं है सही शब्द या तो दवा है या दवाईयाँ, दुकानों पर लिखा मिष्ठान शब्द ही गलत है क्योंकि सही शब्द मिष्टान्न है।

कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता और कोई भी शिक्षक सर्वज्ञ नहीं होता, चाहे कितना भी कोई स्वाध्याय कर लें, शादी न करे, घर से कम निकले, शादी विवाह मृत्यु त्यौहार आदि में जाना बन्द करके कोई शिक्षक सारी जिन्दगी पढ़ाई करे फिर भी किसी न किसी प्रश्न पर वो अटक जाएगा क्योंकि विषय और ज्ञान अनन्त है ।

सरकारी स्कूल का अध्यापक कोई भी हो, वो बुद्धिमान अवश्य होगा, उसका कारण साफ़ है, वो कई परीक्षाएं पास करके शिक्षक बनाता है, बी ए, ऍम ए, बीटीसी, जेबीटी,  pre बीएड, फिर बीएड, ऍम एड, tet, ctet, आदि के उपरांत teacher के लिये प्रतियोगी परीक्षा, सिर्फ क्रीम क्रीम प्रतियोगी ही अध्यापक बन पाते हैं ।

कुछ हद तक शिक्षक स्वाध्याय नहीं कर रहा, जिसकी जिम्मेदारी समाज और शिक्षा विभाग की  है, आम इन्सान को नहीं पता कि सरकारी teacher के कैरियर में 40% fild work है, 40% लिखा पढ़ी और सिर्फ 20% अध्ययन अध्यापन है, field work मतलब शिक्षक गाँव में या शहर में घूमता है, उसको स्कूल परिसर में बैठने  का वक्त नहीं, बाल गणना, जनगणना, pulse पोलियो, चुनाव, सर्वे, पोषाहार के लिये दाल सब्जी मिर्च मसाले लाना, अभी चूल्हे cylinder लाने के लिये मशक्कत की, और सबसे बड़ा कार्य b.l.o. गाँव में घूमते रहो, फिर आये दिन ट्रेनिग, नामांकन और वोटर कार्ड बनाने के लिये द्वार-द्वार घूमो, छात्रवृति वाले काम के लिये बच्चों और अभिभावकों से आय प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र की माथापच्ची में पूरा जुलाई निकल जाता है , बोर्ड एग्जाम में तो सिर्फ  govt टीचर की ही ड्यूटी लगाती है तो मार्च में सरकारी स्कूल खाली हो जाते हैं, वृक्षारोपण अभियान  में पेड़ लेने भागो, निशुल्क पाठ्य पुस्तक लेने भागो,  निशुल्क गणवेश भी तो वितरित करना है उसका भी इन्तजाम करना है, राशन कार्ड और आधार कार्ड की ड्यूटी, बैंक का काम, बच्चों की पढ़ाई गयी भाड़ में , रोजाना नई नई सूचनाये विभाग मागता है और तरह तरह की u.c., किसी स्कूल में कमरा office निर्माण कार्य आ गया तो समझो 6 महीने गए, कभी पोषाहार की डाक जाती है to कभी छात्रवृति की, कभी dise बुकलेट भरो, तो कभी अनीमिया गोलियों की डाक, स्कूल आकर कोई आम इन्सान देखे तो पता चलेगा कि सरकारी स्कूल डाकखाना है।
शिक्षक स्वाध्याय कैसे करे? क्या करे? इस अजीबोगरीब माहोल में , और पढ़ाई चाहिए भी किसको? हर कोई पास भर होना चाहता है, डिग्री चाहता है, ज्ञान किसको चाहिए? एक तरफ गुणवत्ता सुधारने के लिये ncert books लगा दी गयी और जिनका standard ऐसा कि विज्ञान की किताब पढ़ाने के लिये lab की जरूरत है क्योंकि सारे प्रयोग हैं, सरकारी स्कूल में chalk duster black बोर्ड की व्यवस्था होती नहीं सही से, बाकी lab की  बात ..... ? कक्षा कमरे हैं सही लेकिन एक में कबाड़ पडा है, एक में चावल गेहूं और एक में पोषाहार पकाने के लिये लकड़ी भरी है, और एक में ऑफिस अलमारी, एक तरफ ncert books का आदर्शवाद और वहीं बोर्ड result सुधारने के लिये ...........

शिक्षा विभाग भी जादू का खेल है, कभी क्या तो कभी क्या? कभी एकीकरण, कभी समानीकरण, कभी स्टाफिंग pattern, शिक्षक को खुद नहीं पता कि उसका पत्ता कब कट जाएगा?
शिक्षक भी इन्सान है, मीडिया भी बस आदर्शवाद का ढकोसला करता है, अंतेष्टि गलत लिखा शिक्षिका ने तो उसका फोटो खींच लिया, किसी बच्चे ने चाहे खुद ही खुद को चोटिल कर  दिया हो लेकिन बड़े बड़े अक्षरों में खबर छपेगी 
"शिक्षक ने  पीटा"
"शिक्षक की करतूत "
कोई भी शिक्षक स्कूल में बैठकर time pass नहीं करता, बच्चों को उनके मां बाप भी गलत काम पर पिटाई करते हैं, शिक्षक राक्षस नहीं है, अगर कोई एक शिक्षक गलती करता है तो पूरा शिक्षक समुदाय की गलती सिद्ध नहीं हो जाती, पढ़ाई कोई घुट्टी नहीं है कि बच्चे का मुँह खोला और दो बूँद डाल दी, अनुशासन के लिये भय भी जरूरी होता है,  मीडिया को बहुत शौक है सच छापने का तो किसी स्कूल में कुछ दिन काटकर आये, देखे शिक्षक की दोहरी तिहरी जिम्मेदारी और माहौल ,
विश्व का सारा ज्ञान और विकास शिक्षा और शिक्षक के कारण ही वजूद में आया है, सरकारी शिक्षक बहुत ही निरीह और आम इन्सान है, वो अपना 100% देना चाहता है, ये जरूर है कि वो दबावों में है, शिक्षण बस एक नौकरी भर नहीं है। अफसर मीडिया और समाज तीनों शिक्षक के प्रति अनुदार हैं, और शिक्षक की गलत छवि पेश कर रहे हैं।

शिक्षा व्यवस्था के सन्दर्भ में आज से पचास वर्ष पहले श्रीलाल शुक्ल जी ने एक कड़वी मगर सच बात राग दरवारी में लिखी थी, जोआज भी प्रासंगीय है "सरकारी शिक्षा रास्ते में पड़ी हुई एक कुतिया है, जिसको कोई भी ठोकर मारकर चला जाता है। जो भी मंत्री, अधिकारी आते हैं बजाय इसके कि वह शिक्षा व्यवस्था को ठीक करें, शिक्षकों को जिम्मेदार मानकर बात शुरू करता है। हर आदमी सरकारी शिक्षा के खिलाफ वक्तव्य देकर चला जाता है, मगरउसके लिए कुछ नहीं करता।"

जय भारत               जय शिक्षक

Shiv Kumar Monday, January 4, 2016
New format for casual leave


एन एन आई की बड़ी खबर
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लखनऊ मंडल के सभी परिषदीय स्कूलों में निर्धारित फॉर्मेट से छुट्टी लेनेका आदेश जारी : शिक्षक बंक नहीं कर पाएंगे स्कूल

लखनऊ-:
======= सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिएगुरुवार को एडी बेसिक ने एडवांस एप्लिकेशन फॉर्मेट जारी किया है। इस फॉर्मेट के बाद शिक्षक स्कूल बंक नहीं कर पाएंगे और उनके द्वारा ली गई सभी आकस्मिक छुट्टियों का ब्योरा रखना आसान होगा। बेसिक शिक्षा विभाग नेफिलहाल लखनऊ मंडल के सभी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में इस फॉर्मेट से छुट्टी लेने का आदेश जारी कर दिया है।शिक्षकों को साल में जितनी आकस्मिक छुट्टी मिलती हैं क्रमांक संख्या के साथ उन्हें उतने ही फॉर्म दे दिए जाएंगे।
इन फॉर्म पर ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर (बीईओ) के प्री हस्ताक्षर होंगे। शिक्षक जब भी छुट्टी पर जाएंगे तो वहीं फॉर्म उन्हें देंगे। फॉर्म खत्म होने के बाद उन्हें छुट्टी के लिए पूर्व सूचना देनी होगी। अब तक शिक्षक एक सादे पेपर पर एप्लिकेशन देते थे। इससे एक ओर एप्लिकेशन के फर्जी होने के संभावना होती थी तो दूसरी ओर यह गणना नहीं हो पाती थी कि किस शिक्षक ने पूर्व कितनी छुट्टी ली हैं।

Shiv Kumar Sunday, January 3, 2016

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