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पढ़ने का हक़
आज की कहानी का शीर्षक
‘पढ़ने का हक़ ~ कौन बनेगा शिक्षा अधिकार दूत?’

मीना के स्कूल में स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी चल रही है।  मीना और रानो स्कूल के सूचनापट पर उस कार्यक्रम से सम्बंधित एक पर्चा लगा रहीं है।  पर्चा उड़ गया.......जो उड़ता-उड़ता स्कूल के बाहर चला गया।  

मीना और रानो, उड़ते हुए पर्चे के पीछे भागी।  तेज़ हवा चलने के कारण पर्चा उड़ते-उड़ते स्कूल से काफी दूर चला गया था।  आखिरकार वो पर्चा जा चिपका....सामने से आते हुए लालाजी की कमीज पे, लालाजी के साथ उनका पड़ोसी भोला भी था। 

मीना भोला चाचा से कहती है, ‘भोला चाचा, १५ अगस्त को हमारे स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन किया जा रहा है।  उसी कार्यक्रम से सम्बंधित सूचना लिखी है इस पर्चे पे।

भोला- हुंह्ह....स्वतंत्रता दिवस समारोह, स्कूल का मतलब होता है-पढ़ाई, लिखाई और इम्तिहान.......उसका क्या?

रानो- लेकिन हमारे स्कूल में तो वार्षिक इम्तिहान होते ही नहीं।

भोला- अरे भई, अगर इम्तिहान ही नहीं होंगे तो तुम्हारी बहिन जी को कैसे पता चलेगा की किस बच्चे ने कितना सीखा? अगर इम्तिहान ही नहीं होंगे तो बच्चे दिल लगा के पढेंगे ही नहीं।

लालाजी ने भी सुर मिलाया, ‘ठीक कह रहे हो भोला। ’

मीना- लालाजी,भोला चाचा.....बहिन जी ने हर बच्चे से कहा है कि वो स्वतंत्रता दिवस समारोह में अपने-अपने माता-पिता को बुलायें....आप भी हमारे कार्यक्रम में आयेंगे ना।

भोला- हाँ-हाँ क्यों नहीं?

रानो, मीना स्कूल पहुंचे।  मीना ने सारी बातें अपनी बहिन जी को बताई

बहिन जी कहती हैं, ‘शिक्षा तो है हर बच्चे का अधिकार....शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत एक नियम सोच समझकर बनाया गया है कि आंठवी कक्षा तक किसी भी बच्चे को वार्षिक परीक्षा ना देनी पड़े ताकि बच्चों पर परीक्षा को लेकर कोई बोझ न पड़े। ....शिक्षा का अधिकार यह सुनिश्चित करता है कि आंठवी कक्षा तक हर बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त हो। 

मीना- बहिन जी जैसे लालाजी और भोला चाचा को ये बात पता नहीं थी, हो सकता है ऐसे ही कई बच्चों के माता-पिता ये बात ना जानते हों।  बहिन जी मेरे पास एक तरकीब है.....क्यों न हम स्वतंत्रता दिवस समारोह में शिक्षा के अधिकार से जुड़े सवाल जबाव का खेल आयोजित करें।  जिससे लोगों को इस विषय में जानकारी मिले।

बहिन जी- हूं...तरकीब तो बहुत अच्छी है....मीना, रानो प्रश्न उत्तर बनाने में मैं तुम्हारी मदद करूंगी।
और स्वतंत्रता दिवस समारोह में गाँव के सभी लोग स्कूल में आये।  झंडा फहराने और राष्ट्र गान के बाद कार्यक्रम के मुख्य अथिति सरपंच जी मंच पे आये और बोले, ‘भाइयो,बहिनों और प्यारे बच्चों, आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत बधाई।  आज हमारे स्कूल के बच्चों ने प्रश्न उत्तर के खेल का आयोजन भी किया है जिसका नाम है- ‘कौन बनेगा शिक्षा अधिकार दूत’..अब मैं मंच पर आमंत्रित करूंगा रानो और मीना को.....। 

(तालियों की गडगडाहट होती है। )

मीना- सभी का स्वागत है इस खेल में जिसका नाम है- ‘कौन बनेगा शिक्षा अधिकार दूत’

ये रहा पहला सवाल- सुशील और सौरभ दो भाई हैं, दोनों चौथी कक्षा में पढ़ते हैं।  लेकिन परीक्षा के बाद सुशील तो पाँचवी कक्षा में चला गया क्योंकि वो पास हुआ था लेकिन फेल होने के कारण सौरभ चौथी कक्षा में ही रह गया। ......अब बताइये क्या इस तरह किसी बच्चे को फेल किया जा सकता है?

सुमी जबाब देती है, ‘अब ऐसा नहीं किया जा सकता....वो इसलिए क्योंकि आंठवी कक्षा तक किसी भी बच्चे को कानूनन फेल नहीं किया जा सकता।  और हाँ....शिक्षक का दायित्व है कि वो प्रत्येक बच्चे की मदद करे। ’ बहिन जी जोड़ती हैं, ‘तभी तो आजकल परीक्षा नहीं ली जाती समीक्षा की जाती है। ’ तारा आगे कहती है, ‘ऐसा इसलिए भी है कि अक्सर परीक्षा के कारण बच्चे पर बहुत मानसिक दवाव पड़ता है। ’

अब अगला सवाल- रुखसाना के माता-पिता उसका दाखिला करवाने एक सरकारी स्कूल में गए लेकिन रुखसाना का जन्म प्रमाण पत्र न होने के कारण उन्हें दाखिला कराये बिना ही लौटना पड़ा।

रवि उत्तर देता है, ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि जब से शिक्षा एक कानूनी अधिकार बना है दाखिले की प्रक्रिया सरल करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र के अलावा आयु प्रमाण पत्र को भी मान्यता मिली है।

अब तीसरा सवाल- विद्यालय प्रबन्ध समिति की सभा में अभिभावक, अध्यापक और छात्र एक साथ हिस्सा लेते हैं ताकि स्कूल के विकास की योजना बनाई जा सके और स्कूल द्वारा सेवित क्षेत्रों से आने वाले बच्चों का ब्योरा तैयार हो सके।

‘ये बात सही है। ’-सबीना जबाब देती है।

अब आज का आखिरी सवाल- इन तीन चीजों में से टीचर को क्या-क्या करना चाहिए-
  • 1. टीचर को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि स्कूल बच्चे के अनुकूल हो।
  • 2. टीचर, शिक्षण और तैयारी के लिए हर हफ्ते निर्धारित घंटे स्कूल में उपस्थित होना चाहिए।
  • 3. टीचर को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वो सभी बच्चों के प्रति एक सामान व्यवहार रखे।
सभी ने दिया इस सवाल का सही जबाब इसलिए ये सब कहलाये ‘शिक्षा अधिकार दूत’

खेल ख़त्म होते ही लालाजी सरपंच जी के पास पहुंचे ...

लालाजी- सरपंच जी,.....क्या शिक्षा का अधिकार कानून हमारे गाँव के स्कूल और सभी बच्चों पे लागू होता है?

सरपंच जी जबाब देते है, ‘जी हाँ लालाजी, इस क़ानून के विषय में और अधिक जाने के लिए कोई भी अभिभावक मुझसे या बहिन जे से स्कूल आकर मिल सकता है।  इस अधिकार का एक लक्ष्य यह भी है कि बच्चे के माता-पिता और टीचर एक साथ मिलके अपने बच्चे के शैक्षिक विकास की योजना बना सकें।
लालाजी- सरपंचजी, अब से मैं भी सबको शिक्षा के अधिकार के बारे में बताऊंगा।

मिठ्ठू चहका, ‘शिक्षा का अधिकार, प्रगति का आधार’

मीना, मिठ्ठू की कविता-
“मुफ्त मिलेगी शिक्षा, स्कूल भी बच्चे के अनुकूल
शिक्षा का अधिकार नहीं तुम जाना इसको भूल। ’’ 

आज का गीत- 
टन-टन-टन सुनो घंटी बजी स्कूल की 
चलो स्कूल तुमको पुकारे। 
पल-पल-पल रोशनी जो मिली स्कूल की 
जगमगाओगे तुम बनके तारे
टन-टन-टन..............
कॉपी और किताबें सारी स्कूल देगा-स्कूल देगा
यूनिफार्म भी तुम्हारी स्कूल देगा-स्कूल देगा
स्कूल अब घर से दूर नहीं है कम हो गए फासले 
पहुंचोगे स्कूल के गेट पर थोडा सा भी जो चले
प्यार और नरमी से तुमको पढ़ायेंगे टीचर हैं ऐसे भले
टन-टन-टन.......................। 
टन-टन-टन- ‘शिक्षा मेरा अधिकार है’

आज का खेल- ‘अक्षरों की अन्त्याक्षरी’
शब्द- ‘अनार’
‘अ’- आंख (आँख का तारा होना)
‘न’- नाक (नाक में दम करना)
‘र’- राग (अपनी ढपली अपना राग)

Shiv Kumar Sunday, October 11, 2015
सावधान
आज की कहानी का शीर्षक- ‘सावधान’

मीना अपने घर के आँगन में बैठी कविता याद कर रही है। उसका भाई राजू झूला झूल रहा है। तभी शबीना वहां पहुँचती है, जिसके हाथ में फ़ोन है। सबीना बताती है, ‘ये मेरे बाबा का है जो बाहर गए हुए हैं। वो जब चाहें हमसे बात कर सकते हैं।........अरे मीना, ज़रा देखो तो इसकी आवाज़ बंद ही नही हो रही।’

मीना फोन की आवाज़ बंद कर देती है। अचानक राजू झूला झुलते-झूलते गिर जाता है।...एकदम से रस्सी कैसे टूट गयी? राजू कहता है कि उसकी रस्सी पहले से ही चटकी हुयी थी, मैंने ध्यान नहीं दिया।

दादी समझाते हुए कहतीं हैं, ‘हमें खतरे से पहले से ही होशियार हो जाना चाहिए।’

सबीना अपने घर चली जाती है। मीना पाती है कि शबीना अपने फोन का चार्जर तो यहीं भूल गयी है तो वह चार्जर देने शबीना के घर जाती है।

शबीना के माँ बताती है, ‘शबीना तो सुबह से ही चार्जर लेने तुम्हारे घर गयी हुयी है।’ सब चिंतित होते हैं।...और तभी शबीना के मोबाइल की घंटी बजने की आवाज़ आती है। मीना कहती है, ‘....आवाज़ तो सुरेश के घर से आ रही है।’

सभी सुरेश के घर की तरफ बढ़ते हैं.....और जैसे ही दरवाजे के पास पहुँचते हैं दरवाजा अपने आप खुलता है और शबीना रोती हुयी बाहर निकलती है।

शबीना सारी बात अपनी माँ को बताती है, ‘.....सुरेश मोबाइल चार्जर के बहाने से उसे अपने घर ले गया था और उसने गंदी-गंदी तसवीरें दिखाईं और अपने पास बैठने को कहा।’

उसे अपनी बहिन जी की कही बात याद आती है, “खतरा आने से पहले उसका आभास कर लिया करो।”...फिर मैंने अपने फोन की घंटी तेज़ कर दी...वह जैसे ही उसे बंद करने गया वैसे ही मैं निकल आयी।

...फिर १०९८ पर फोन किया जाता है और पुलिस सुरेश को गिरफ्तार कर के ले जाती है।

मीना,मिठ्ठू की कविता-

“कभी जो आओ तुम मुश्किल में, कभी ना घबराना
कोई न हो तो तुम १०९८ पर फोन घुमाना।” 

आज का गीत-
नादान नहीं हम नहीं अनजान
अच्छे बुरे की है हमें पहचान
आता है रखना हमको अपना ध्यान
अच्छे बुरे की है हमें पहचान
ये ना समझो हम घबरायेंगे चुप कर जायेंगे
बुरी नज़र डालोगे तो हम तुमसे लड़ जायेंगे
सारी बात बड़ों से जाकर हम तो देंगे बोल
मत सोचो खामोश रहेंगे खोलेंगे हम पोल
अपनी हिम्मत पे है हमें अभिमान
अच्छे बुरे की है हमें पहचान
कोई हमको छुए जो बिना हमारी मर्जी
पुलिस में जाके देंगे हमतो तो उसके नाम की अर्जी
कभी ज़रा भी आये हमको खतरे की आहट
१०९८ पे फोन मिलाकर करेंगे उसकी शिकायत
कब कैसे और क्या करना है हमें है पूरा ज्ञान
अच्छे बुरे की है हमें पहचान

आज का खेल- ‘अक्षरों की अन्त्याक्षरी’
शब्द- ‘सहारा’
‘स’- सब्र( सब्र का फल मीठा होता है)
‘ह’- हर (हाथ बढ़ाना)
‘र’- रंग (रंग बदलना)

Shiv Kumar
छुपन-छुपाई
कहानी का शीर्षक- ‘छुपन-छुपाई’

मीना दीपू,सुनील,सुमी और रानो के साथ छुपन-छुपाई खेल रही है।

सबसे पहले मीना की बारी.....फिर आती है बारी दीपू की.....कि तभी रोहन वहां पहुँच जाता है।

सुमी- मीना, ये रोहन भईया हैं,पाशा के मौसी जी के बेटे....शहर के कॉलेज में पढाई कर रहे हैं,शायद अब आख़िरी साल में होंगे। ......दो साल पहले रोहन भईया पाशा के घर रहने आये थे।  तो हम तीनों, रोज़ शाम को पाशा के आँगन में खूब खेला करते थे।

दीपू कहता है, ‘ये तो इतने बड़े हैं इनके साथ खेलने में बिलकुल भी मज़ा नहीं आएगा। ’

सब खेलना शुरु करते हैं।  दीपू रानो को आउट कर देता है।  दीपू और रानो ने देखा कि सुमी घास के ढेर की तरफ से उनकी तरफ चली आ रही है...रोहन भी उसके पीछे-पीछे चला आ रहा था।  सुमी ने जोर से आवाज़ देके मीना और सुनील को बुलाया।  मीना और सुनील भाग के वहां आ गए।  सुमी बहुत गुस्से में लग रही थी।

सुमी- मैं घर जा रही हूँ मीना।

मीना उसे आवाज़ देती रही और सुमी वहां से चली गयी।

रोहन- जाने दो, चलो हम लोग खेलते हैं।

मीना रोहन के सिर पर घास लगी देखकर रोहन से पूंछती है, ‘रोहन भईया,क्या आप सुमी के साथ ही घास के ढेर में छूपे थे?’

रोहन हडबडा के वहां से चला गया।  उसके जाने के बाद मीना अपने दोस्तों को लेके सुमी के घर पहुंची ....उन्होंने देखा सुमी अपने घर से थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी।

तभी बहिन जी भी वहां पहुँच जाती हैं जो बाज़ार तक जा रहीं थी।

बहिन जी- सुमी,...क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो?

मीना बहिन जी को सारी बात बताती है।

सुमी- बहिन जी, मुझे आपसे अकेले में कुछ बात करनी है।

सुमी बहिन जी को बताती है, ‘बहिन जी, छुपन-छुपाई खेलते समय मैं और रोहन भईया घास के ढेर में छुप गए थे।  रोहन भईया ने मुझे कस के गले से लगा लिया। .....मुझे बहुत बुरा लगा,इसीलिये मैं वहां से भाग आयी।

सुमी की बात सुनने के बाद बहिन जी ने उसकी हिम्मत बढाई और फिर सुमी के घर जाके उसके माता-पिता से इस बारे में बात की। 

बहिन जी सुमी को समझाते हुए कहती हैं, ‘....एक बात याद रखना...हमारी मर्जी के बिना हमारे शरीर को छूने का अधिकार किसी को भी नहीं है,किसी रिश्तेदार या सम्बन्धी को भी नहीं। .....किसी को भी नहीं।

सुमी ने बहिन जी को बताया, ‘...उसने कहा था कि ये बात मैंने किसी को बताई तो अच्छा नहीं होगा। ’

बहिन जी सुमी का हौसला बढाती हैं और उसके माता-पिता को बाल संरक्षण समिति के किसी सदस्य से मिलने को कहतीं हैं।

मीना की बहिन जी ने पुलिस में रोहन के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई।  पुलिस रोहन को गिरफ्तार करके ले जाती गयी।  और अगले दिन स्कूल में......

बहिन जी बच्चों को समझाती हैं, ‘ ...तुम सब अब बड़े हो रहे हो इसीलिए तुम्हें कुछ और चीजों का ध्यान रखना होगा जैसे कि तुम्हे ये भेद करना आना चाहिए कि कोई तुम्हें प्यार से छू रहा है या बुरी नियत से। 

.....अगर किसी के छूने से हमें खुशी मिले, प्यार का आभाष हो तो समझो वो हमें अच्छी नियत से छू रहा है।  लेकिन अगर किसी के छूने से बुरा लगे,घबराहट हो या फिर शर्म या गुस्सा आये तो इसका मतलब वो हमें बुरी नियत से छू रहा है।

जब हम ऐसे मामलों में छुप रहते हैं तो गलती करने वालों की और भी हिम्मत मिलती है, इसीलिये ऐसी बातें तुरंत किसी बड़े को बतानी चाहिए।  या चाइल्ड लाइन १०९८ पे फोन करना चाहिए या फिर जिला बाल सुरक्षा अधिकारी को संपर्क करना चाहिए। .......इसमें शर्माने या घबराने की कोई बात नहीं हैं क्योंकि शर्माता तो वो है जो गलती करता है।

मीना, मिठ्ठू की कविता-
“कोई नहीं छू सकता तुमको जबरदस्ती ये जानो,
डरो नहीं, न घबराओ अपने आप को पहचानो। ”

आज का गीत-
नादान नहीं हम नहीं अनजान
अच्छे बुरे की है हमें पहचान 
आता है रखना हमको अपना ध्यान 
अच्छे बुरे की है हमें पहचान 
ये ना समझो हम घबरायेंगे चुप कर जायेंगे
बुरी नज़र डालोगे तो हम तुमसे लड़ जायेंगे
सारी बात बड़ों से जाकर हम तो देंगे बोल
मत सोचो खामोश रहेंगे खोलेंगे हम पोल
अपनी हिम्मत पे है हमें अभिमान 
अच्छे बुरे की है हमें पहचान 
कोई हमको छुए जो बिना हमारी मर्जी
पुलिस में जाके देंगे हमतो तो उसके नाम की अर्जी
कभी ज़रा भी आये हमको खतरे की आहट
१०९८ पे फोन मिलाकर करेंगे उसकी शिकायत
कब कैसे और क्या करना है हमें है पूरा ज्ञान
अच्छे बुरे की है हमें पहचान 

आज का खेल- ‘अक्षरों की अन्त्याक्षरी’

शब्द- ‘शक्ति’
‘श’- शर्म (शर्म से पानी-पानी होना)
‘क’- कान (कान पे जूँ न रेंगना)
‘त’- ताला (अक्ल पे ताला पड़ना)

Shiv Kumar
कान आँख खोल के
कहानी का शीर्षक- ‘कान आँख खोल के ’
(काम की ज़िम्मेदारी)

मीना आज पतंग उड़ा रही है। पतंग की डोर टूट जाती है.....मीना पतंग पकड़ने के लिए भागी। वो अपनी आँखें जमाये उसके पीछे भाग रही थी। तभी उसकी पतंग जा फंसी रीता के घर के सामने वाले पेड़ की टहनियों में। मीना उछल-उछल कर पतंग की डोर को पकड़ने की कोशिश कर रही थी। जिसे देख के वहां खड़ा श्रवण (रीता का भाई) हँसने लगा।

मीना पेड़ पर चढ़ कर पतंग उतार लाई।
श्रवण- मीना तुमने तो कमाल कर दिया।

मीना- इसमें कमाल कैसा श्रवण? पेड़ पर चढ़ना कोई मुश्किल काम थोड़े ही ना है। वैसे तुम यहाँ खड़े-खड़े क्या कर रहे हो?

श्रवण बताता है कि वह डाकिया चाचा की राह देख रहा है।......अपनी चिठ्ठी का इंतज़ार करता है। दरअसल कई दिन पहले......

तभी श्रवण की माँ उसे घर के काम निपटाने को आवाज़ लगाती है। घर में मेहमान आने वाले हैं और रीता को थोड़ी देर के बाद बेला के साथ मेले में जाना है....। माँ कहती है कि मैं कपडे धो रही हूँ तुम उन्हें तार पर डाल देना।

श्रवण- ....तुम कहो तो कुएं से पानी भरकर ले आऊंगा मैं।

मीना उसे कपडे सुखाने की सलाह देती है। श्रवण कहता है, ‘ ये घर के काम करना, मुझे नहीं अच्छा लगता। बहुत शर्म आती है मुझे ये सब करने में...और वैसे भी कपडे सुखाना, वर्तन मांजना,खाना बनाना, घर साफ करना ...ये सब लड़कियों के काम हैं।

मीना, श्रवण को राजू का उदहारण देते हुए समझाती है, ‘ मेरा भाई राजू....जब भी जरूरत होती है वो घर के कामों में मेरा और माँ का हाथ बटाता है।’

तभी श्रवण की माँ पानी भरने को फिर से आवाज़ लगाती हैं। श्रवण भागता हुआ कुएं पर गया और जल्दी से पानी भरकर ले आया।

.......मीना ने श्रवण को उसकी चिठ्ठी दी जो लेखुराम ने श्रवण को लिखी है। ‘लेखूराम...मशहूर लेखक’। श्रवण मीना को बताता है, ‘दरअसल मैं लेखूराम को अपनी कई कहानियां भेज चुका हूँ और मैं हर चिठ्ठी में उनसे निवेदन करता हूँ कि वो मुझे बताएं कि उन्हें मेरी कहानियां कैसी लगी?....और देखो, आज उनका जबाब भी आ गया।

श्रवण लिफाफा खोल के चिठ्ठी पढ़ता है- “प्रिय श्रवण, मैंने तुम्हारी लिखी सारी कहानियां पढी, वो कहानियां मुझे कैसी लगी ये मैं तुम्हें मिलके बताऊंगा।...श्रवण तुम्हे ये जाँ के खुशी होगी कि मेरी बहन तुम्हारे ही गाँव में रहती है और मैं इस महीने की १६ तारीख को एक दिन के लिए अपनी बहन के पास आ रहा हूँ ..हो सके तो मुझसे मिलना। तुम्हारा शुभचिंतक- लेखुराम”

‘....अरे हाँ १६ तारीख तो आज ही है। मैं जल्दी से लेखूराम से मिलने जाता हूँ।’

मीना- श्रवण, पहले चाची जी और रीता को ये खुशखबरी दो।

श्रवण ने रीता और अपनी माँ को सारी बात बताई।जिसे सुन के वो दोनो बहुत खुश हुईं।
श्रवण की माँ- ये तो बहुत खुशी की बात है, तुम लेखूराम से मिलने जरूर जाओ लेकिन घर के काम में मेरी मदद करके।

श्रवण की माँ उसे समझाती है, ‘काम तो काम होता है बेटा, फिर इसमें अच्छे बुरे की क्या बात है?....तुम्हें जाना है जरूर जाओ लेकिन घर के काम में मेरी मदद.....।

श्रवण- ठीक है, नहीं जाऊँगा मैं लेखूराम से मिलने.....हुंह।

मीना- अरे, तुम गुस्सा क्यों हो रहे हो श्रवण। चाचीजी,आप श्रवण को जाने दीजिये घर के काम में मैं आपकी मदद कर दूंगी।

श्रवण लेखूराम से मिलने उसकी बहन के घर गया। उस समय लेखूराम खाना खा रहा था। खाना खाते-खाते, लेखूराम ने श्रवण से बहुत सी बातें की और फिर....खाना ख़त्म करके उसने अपने वर्तन उठाये और श्रवण से बोला, ‘ मैं ये वर्तन धो के अभी आता हूँ।’

लेखूराम समझाते हुए कहते हैं, ‘अपना काम करने में शर्म कैसी?’...घर के काम करने की जिम्मेदारी जितनी लड़कियों की है उतनी लड़कों की भी है। और वैसे भी ये काम लड़कियों के है वो लड़कों के हैं, मुझे न ये कहना अच्छा लगता है न ही सुनना।’ 

लेखूराम की बात सुनके श्रवण गहरे सोच में पड़ गया। शायद उसे एहसास हो रहा था कि उसे घर के काम करने में रीता और माँ का हाथ बताना चाहिए था।


मीना, मिठ्ठू की कविता-
“सारे लडके सभी लडकियाँ बात ये रखना ध्यान,
घर के काम की जिम्मेदारी सबकी एक सामान।’

आज का गीत-
हाँ लडकियों को आगे बढ़ना है क्यों रोकते हो।
क्यों कसते हो ताने-वाने,फब्तियां, क्यों टोकते हो?
हमें भी काम अपने मार्जियों का करना है 
हमें भी आसमां में पंछियों सा उड़ना है।
हर एक कहानी के हर एक किस्से में हमारा हिस्सा है
और एक हिस्से में .......
तभी तो कहते हैं कि तुम और हम
बराबर- बराबर- बराबर.....
...कोई जो हमको ....तो दिल दुखता है
ख्वाब बिखर जाते हैं फिर सभी मन के 
क्यों न हम रहे अच्छे दोस्त बनके 
अबसे नहीं तुम सताना हमको 
न कभी छेडना हमको।
क्योंकि तब तुम और हम है 
बराबर-बराबर-बराबर...¬.....।

आज का खेल- ‘अक्षरों की अन्त्याक्षरी’

  • शब्द- ‘तमस’ (अँधेरा)
‘त’- तिनका (डूबते को तिनके का सहारा)
‘म’- मुंह (मुंह का मीठा)
‘स’- सर (सर ओखले में देना

Shiv Kumar
अनजान आदमी
आज की कहानी का शीर्षक-
 ‘अनजान  व्यक्ति  ~ अनजान आदमी’

मीना की बहिन जी स्कूल में पूरी क्लास को कुछ बता रहीं है।

बहिन जी- प्यारे बच्चों जैसा की तुम सब जानते हो, कल स्कूल का वार्षिकोत्सव है। और कल स्कूल में एक ख़ास मेहमान आने वाले हैं.....भारतीय क्रिकेट टीम के मशहूर खिलाड़ी- मोहित सिंह...स्पिन गेंदबाज मोहित सिंह। वो तुम सब से मिलेंगे,तुमसे बात करेंगे और तुम सब को ऑटोग्राफ भी देंगे।


सभी बच्चे खुशी से उछल पड़ते हैं। सुनील लालाजी की दुकान की तरफ दौड़ लगा देता है....नया बैट खरीदने। सुनील कहता है, ‘कल जब मोहित सिंह हमारे स्कूल आयेंगे तो मैं नए बैट पे उनका ऑटोग्राफ लूँगा। मीना भी सुनील के साथ हो लेती है।

लालाजी- आओ बच्चों, क्या लेना है? खम्भा उखाड के।

सुनील- लालाजी....कोई बढ़िया सा क्रिकेट बैट दिखाइए।

....सुनील को जो बैट पसंद आता है उसकी कीमत है- २००/- , लेकिन सुनील के पास १५०/- ही है जो वह अपनी गुल्लक से निकाल के लाया है।

लालाजी उससे कहते है, ‘कोई बात नहीं बेटा, घर जाओ ५०/- और लाओ फिर ये बैट ले जाओ, खम्भा उखाड़ के।

सुनील उदास हो वापस लौटता है। मीना सुनील से कहती है, ‘ऑटोग्राफ तो तुम क्रिकेट बाल या फिर अपनी डायरी में भी ले सकते हो।

सुनील- नहीं मीना, नए बैट पर ऑटोग्राफ लेने की बात ही अलग होती है।

नेपथ्य से आवाज़ गूंजती है- ‘चूड़ी वाला.....चूड़ी वाला....।’

मीना चूड़ी लेने जाती है तथा सुनील वहीँ मीना के लौटने का इंतज़ार करने लगता है। मीना ५-१० मिनट चूड़ियों की दूकान पर रुकी और जब वो वापस आयी तो.....सुनील वहां नहीं था।

सुनील पीछे से आवाज़ लगाता है, वह बर्फी खा रहा है जो उसे रमेश भईया ने दी है।

मीना- रमेश भईया, ये रमेश भईया कौन है?

सुनील मीना को सारी बात बताता है, साथ ही कहता है, ‘रमेश भईया बैट खरीदने के लिए पैसे भी देंगे।’

मीना,सुनील को समझाती है कि, ‘बहिन जी ने कहा था कि हमें कभी भी किसी अनजान आदमी से कोई मिठाई या खाने पीने की चीजें नहीं लेनी चाहिए।’

तभी रमेश पीछे से आकर कहता है, ‘सुनील तुम्हें मेरे घर चलना होगा।’

मीना, सुनील से वहां से चलने को कहती है....

सुनील, रमेश से कहता है कि वह कल उसके घर आ जायेगा...रमेश का घर पहाड़ी के पीछे कच्ची ईंटों वाल घर है।

और जब मीना और सुनील, मीना के घर पहुंचे तब......सुनील मीना से , ‘उसकी गुल्लक मैं पैसे हैं।’ झूंठ क्यों बोला? मीना उसे समझाती है।

और उदास हो सुनील अपने घर चला गया और अगले दिन स्कूल में....

मोहित सिंह २-३ घंटे में यहाँ पहुँच जायेंगे लेकिन सुनील अभी तक स्कूल नहीं पहुँचा।

बहिन जी- ये कैसे हो सकता है? सुनील तो मोहित सिंह का बड़ा फैन है।

मीना ने बहिन जी को सारी बात बताई। पूरी बात सुनने के बाद बहिन जी ने सुनील के घर जाने का फैसला किया।

सुनील के पिताजी- क्या? सुनील स्कूल नहीं पहुँचा, लेकिन बहिन जी सुनील तो सुबह ही स्कूल के लिए निकल गया था।

मीना- इसका मतलब सुनील बाज़ार गया होगा..बैट खरीदने.....। चाचाजी क्या सुनील ने आपसे कुछ पैसे मांगे थे?..बैट खरीदने के लिए।

सुनील के पिताजी बताते है, ‘ कल रात सुनील कुछ बात तो करना चाह रहा था लेकिन मैं अपने काम की वजह से थोड़ा परेशान था तो...मैंने ध्यान नहीं दिया और उसे चुप रहने को कहा।’

मीना ने सुनील के पिताजी को सारी बात बताई। जिसे सुनके सुनील के पिताजी बोले, ‘ बहिन जी मुझे सुनील की बहुत चिंता हो रही है।’

मीना रमेश का घर जानती है। सब वहां पहुँचते है तो मकान पे ताला लगा पाते हैं।

तभी मिठ्ठू चिल्लाया, ‘ताला लगा हुआ है,सुनील रस्सी से बंधा हुआ है।’

सुनील के पिताजी दरवाजा तोड़ कर अन्दर जाते हैं। बहिन जी ने तुरंत पुलिस को फोन किया....पुलिस वहां पहुँची और उन्होंने रमेश को गिरफ्तार कर लिया। रमेश एक खतरनाक अपराधी था जो भोले भाले बच्चों को रुपये पैसे,....चॉकलेट, मिठाई बगैरह का लालच देके उन्हें अपने जाल में फँसा लेटा था और उन्हें शहर ले जा कर उनसे मजदूरी करवाता था।

सुनील को अपनी गलती का अहसास हुआ। साथ ही सुनील के पिताजी को भी अपनी भूल का अहसास होता है।
बहिन जी समझाती हैं, “भाई साहब, हर बच्चे के माता पिता को अपने घर का माहौल ऐसा रखना चाहिए जिससे बच्चा खुद को आज़ाद,खुश और सुरक्षित महसूस करे। माता-पिता को बच्चे के साथ एक दोस्ती का रिश्ता बना के रखना चाहिए ताकि बच्चा उनसे अपने दिल की बात करते हुए झिझके नहीं। क्योंकि जिन बच्चों को घर में प्यार और सही सलाह नहीं मिलती तो रमेश जैसे अपराधी की चिकनी चुपड़ी बातों में फस जाते हैं।”

मीना और सुनील, बहिन जी के साथ जल्दी से स्कूल पहुंचे।........मोहित­ सिंह ने एक नए बैट पर सुनील को ऑटोग्राफ जो उसके पिताजी खरीदकर लाये थे।

मीना,सुनील को समझाती है कि, ‘बहिन जी ने कहा था कि हमें कभी भी किसी अनजान आदमी से कोई मिठाई या खाने पीने की चीजें नहीं लेनी चाहिए।’



आज का गीत-
हम हैं समझदार..........हम है होशियार.........
समझदार हम,होशियार हम, नहीं है भोले-भाले
किसी गैर के झांसे में हम नहीं हैं आने वाले-२
लाख दे हमको लालच कोई कितनी बात बनाले
किसी गैर के झांसे में हम नहीं हैं आने वाले-२

बेटा...मेरे साथ चलो, मैं तुम्हारी नौकरी लगवा दूँगा। खूब पैसे कमाओगे।
बेटी....मेरे साथ चलो, तिम्हें टीवी फिल्मों में काम दिलवाऊंगा...खूब नाम कमाओगी।

ऐसी चिकनी चुपड़ी बातें करे जो कोई गैर
हाथ जोड कर मना करें हम अपना मुंह ले फेर
सही फैसला लेने हम जरा न करके देर
बुने कोई तो बुनता रहे अपनी बातों के जाले
क्योंकि...... किसी गैर के झांसे में हम नहीं हैं आने वाले-२

अरे बेटा यहाँ अकेले क्यों बैठे हो? चलो मेरे साथ, मेले मे चलते हैं।

अगर कभी हम खुद को ऐसी मुश्किल मे है पाते
हिम्मत से हम काम हैं लेते जरा भी ना घबराते
माँ बाबा या टीचर जी को सारी बात बताते
हमें बचाने को टीचर जी है और हैं घर वाले
क्योंकि.... किसी गैर के झांसे में हम नहीं हैं आने वाले-२


आज का खेल- ‘अक्षरों की अन्त्याक्षरी’
  • शब्द- ‘मदद’
‘म’- मुंह (अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनना)
‘द’- दुम (दुमम दबा के भागना)
‘द’- दांत( दांतों तले उंगली दबाना)

Shiv Kumar

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